सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग १
रात का अंधकार धीरे-धीरे छंट रहा था, लेकिन कुंतीभोज के महल में राजकुमारी कुंती के मन का अंधकार गहराता जा रहा था। ऋषि दुर्वासा द्वारा दिए गए रहस्यमयी मंत्र का परीक्षण करने की उनकी बाल-सुलभ उत्सुकता ने आज उन्हें गहरे संकट में डाल दिया था।
मंत्र के प्रभाव से साक्षात सूर्यदेव प्रकट हुए और उन्होंने कुंती को एक पुत्र का वरदान दिया। समाज के डर से कुंती ने उस नवजात शिशु को एक मंजूषा में रखकर अश्वनदी में प्रवाहित कर दिया। बालक जन्म से ही स्वर्ण कवच और कुंडल धारण किए हुए था।
हस्तिनापुर के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने उस बालक को नदी से निकाला और अपना लिया। राधा के असीम प्रेम के कारण वह बालक 'राधेय' कहलाया।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: राधेय बड़ा हो रहा है, उसे अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त करनी है। सूतपुत्र होने के कारण समाज उसे कैसे अपमानित करेगा?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग २
राधेय के भीतर एक क्षत्रिय का रक्त उबल रहा था। उसे सारथी का काम रास नहीं आता था, उसके हाथ हमेशा धनुष-बाण की ओर खिंचते थे। जब वह अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया, तो उसे 'सूतपुत्र' कहकर आश्रम से निकाल दिया गया।
अपमानित होकर राधेय ने भगवान परशुराम की शरण ली और खुद को ब्राह्मण बताकर उनसे सर्वश्रेष्ठ विद्या प्राप्त की। एक दिन परशुराम कर्ण की गोद में सो रहे थे, तभी एक जहरीले कीड़े ने कर्ण की जांघ काट ली। गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण भयंकर दर्द सहता रहा।
जब परशुराम की आंख खुली और उन्होंने बहता हुआ रक्त देखा, तो वे समझ गए कि इतनी सहनशक्ति किसी ब्राह्मण की नहीं हो सकती। क्रोधित होकर उन्होंने शाप दिया कि जब कर्ण को अपनी विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, तब वह इसे भूल जाएगा।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: रंगभूमि में सभी राजकुमारों का शक्ति प्रदर्शन होना है। क्या कर्ण वहां अपना कौशल दिखा पाएगा?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग ३
हस्तिनापुर की रंगभूमि में राजकुमारों के शक्ति प्रदर्शन का भव्य आयोजन किया गया था। अर्जुन ने अपने धनुर्विद्या के कौशल से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। तभी भीड़ को चीरता हुआ सूर्य के समान तेजस्वी एक युवा योद्धा आगे आया—वह कर्ण था।
कर्ण ने अर्जुन को द्वंद्व युद्ध के लिए चुनौती दी। लेकिन कृपाचार्य ने नियम का हवाला देते हुए कर्ण की जाति और कुल पूछा। सूतपुत्र होने के कारण उसे अर्जुन से युद्ध के अयोग्य घोषित कर दिया गया।
पूरी सभा में कर्ण का घोर अपमान हो रहा था। ऐसे समय में राजकुमार दुर्योधन आगे आया। उसने कर्ण की वीरता को पहचाना और उसी क्षण उसे अंग देश का राजा घोषित कर दिया। कर्ण ने आजीवन दुर्योधन का साथ निभाने की कसम खाई और यहीं से इतिहास की सबसे गहरी मित्रता का जन्म हुआ।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: पांचाल नरेश की पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर रचा गया है। क्या अंगराज कर्ण उस स्वयंवर में भाग लेंगे?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग ४
पांचाल राज्य में राजकुमारी द्रौपदी के स्वयंवर का भव्य आयोजन हुआ। शर्त अत्यंत कठिन थी—नीचे रखे तेल के कुंड में मछली की परछाई देखकर, ऊपर तेजी से घूमती मछली की आंख को भेदना था। बड़े-बड़े राजा और राजकुमार इसमें असफल हो गए।
तब अंगराज कर्ण अपने स्थान से उठे। उन्होंने अत्यंत सहजता से भारी शिव धनुष को उठा लिया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी। वह मछली की आंख को भेदने ही वाले थे कि तभी द्रौपदी ने उन्हें रोक दिया। द्रौपदी ने भरी सभा में घोषणा कर दी कि वह एक 'सूतपुत्र' से विवाह नहीं करेगी।
कर्ण के स्वाभिमान को गहरी ठेस लगी। वे चुपचाप मुस्कुराए, धनुष नीचे रख दिया और अपने स्थान पर लौट आए। इसके बाद ब्राह्मण वेश में आए अर्जुन ने उस लक्ष्य को भेदा और द्रौपदी को प्राप्त किया।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: देवराज इंद्र ब्राह्मण वेश में कर्ण के पास ऐसा क्या मांगने आएंगे जो उनके जीवन पर संकट बन जाएगा?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग ५
कर्ण अपनी दानवीरता के लिए पूरे आर्यावर्त में विख्यात हो चुके थे। उनका नियम था कि दोपहर में सूर्य पूजा के बाद जो भी उनसे कुछ मांगेगा, वह खाली हाथ नहीं लौटेगा। कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले देवराज इंद्र को अपने पुत्र अर्जुन की चिंता सताने लगी।
इंद्र एक गरीब ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास पहुंचे। सूर्यदेव ने कर्ण को पहले ही सचेत कर दिया था कि इंद्र छल से उनका जन्मजात स्वर्ण कवच और कुंडल मांगने आएंगे। फिर भी, जब ब्राह्मण ने दान मांगा, तो कर्ण ने एक पल की भी देरी नहीं की।
उन्होंने खंजर से अपने शरीर से जुड़ा हुआ कवच और कुंडल काटकर हंसते-हंसते दान कर दिया। इंद्र इस महादान से इतने प्रसन्न और लज्जित हुए कि उन्होंने कर्ण को अपना अमोघ अस्त्र 'वासवी शक्ति' वरदान में दे दिया।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: माता कुंती एक बड़ा रहस्य लेकर एकांत में कर्ण से मिलने पहुंचती हैं। वह कौन सा वचन मांगेंगी?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग ६
युद्ध के काले बादल मंडरा रहे थे। एक दिन माता कुंती गंगा के किनारे प्रार्थना कर रहे कर्ण के पास पहुंचीं। उन्होंने रोते हुए वह रहस्य खोला जिसे बरसों से छिपा कर रखा था—कि कर्ण कोई सूतपुत्र नहीं, बल्कि कुंती का ही सबसे बड़ा पुत्र है।
कुंती ने कर्ण से पांडवों के पक्ष में आ जाने की विनती की। कर्ण ने कहा कि जब समाज ने उसे ठुकराया था, तब केवल दुर्योधन ने उसे सम्मान और स्नेह दिया। अब संकट के समय वह अपने मित्र को धोखा नहीं दे सकता।
लेकिन एक पुत्र होने के नाते कर्ण ने अपनी माता को खाली हाथ नहीं लौटाया। उसने कुंती को वचन दिया कि इस युद्ध में वह अर्जुन के अलावा किसी अन्य पांडव का वध नहीं करेगा। "माता, युद्ध के बाद भी तुम्हारे पांच पुत्र जीवित रहेंगे—या तो अर्जुन के बिना, या फिर मेरे बिना।"
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: कुरुक्षेत्र का भयानक युद्ध आरंभ हो चुका है, लेकिन कर्ण युद्धभूमि से दूर क्यों हैं?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग ७
कुरुक्षेत्र के मैदान में महायुद्ध का शंखनाद हो चुका था। कौरव सेना का नेतृत्व पितामह भीष्म कर रहे थे। लेकिन युद्ध शुरू होने से पहले ही भीष्म ने एक कठोर शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि जब तक वह युद्धभूमि में हैं, सूतपुत्र कर्ण उनके अधीन रहकर युद्ध नहीं करेगा।
भीष्म ने कर्ण को 'अर्धरथी' कहकर उसका अपमान किया। कर्ण ने अपने स्वाभिमान को सर्वोपरि रखा और प्रतिज्ञा की कि जब तक पितामह भीष्म रणभूमि में हैं, वह शस्त्र नहीं उठाएगा।
दस दिनों तक भयानक युद्ध चला। दसवें दिन अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके पितामह भीष्म को बाणों की शय्या पर सुला दिया। कौरव सेना में हाहाकार मच गया। अब दुर्योधन की सारी उम्मीदें केवल अपने परम मित्र अंगराज कर्ण पर टिकी थीं।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: कर्ण युद्धभूमि में उतर चुके हैं। उन्हें कौरव सेना का सेनापति बनाया जाता है। आगे क्या होगा?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग ८
पितामह भीष्म के शरशय्या पर जाने के बाद गुरु द्रोणाचार्य सेनापति बने। जब उनका भी वध हो गया, तब दुर्योधन ने अंगराज कर्ण को कौरव सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया।
कर्ण के रणभूमि में उतरते ही कौरव सेना में एक नया उत्साह भर गया। कर्ण ने भयंकर युद्ध किया। उन्होंने अपनी माता कुंती को दिए वचन का पालन करते हुए नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर और भीम—चारों पांडवों को युद्ध में पराजित किया, लेकिन किसी के प्राण नहीं लिए।
तभी भीम पुत्र घटोत्कच ने कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया। दुर्योधन की व्याकुलता देखकर कर्ण को मजबूर होकर अपना अमोघ अस्त्र 'वासवी शक्ति' घटोत्कच पर चलाना पड़ा। यह वही अस्त्र था जो कर्ण ने विशेष रूप से अर्जुन का वध करने के लिए बचा कर रखा था।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: वह दिन आ गया जिसका सबको इंतजार था। कर्ण और अर्जुन आमने-सामने हैं। इस अंतिम महासंग्राम का क्या परिणाम होगा?
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग ९
कुरुक्षेत्र के सत्रहवें दिन का सूरज मानो आग उगल रहा था। आज कर्ण और अर्जुन का रथ आमने-सामने था। आर्यावर्त के दो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर एक-दूसरे के प्राण लेने को आतुर थे। दोनों के बाणों की बौछार से सारा आकाश ढक गया था।
तभी नियति ने अपना क्रूर खेल खेला। कुरुक्षेत्र की उस रक्त रंजित मिट्टी में कर्ण के रथ का पहिया धंस गया। कर्ण ने अर्जुन से युद्ध के नियमों का वास्ता देते हुए बाण रोकने को कहा, ताकि वह नीचे उतरकर रथ का पहिया निकाल सके।
लेकिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को याद दिलाया कि अभिमन्यु को मारते समय, या द्रौपदी के चीरहरण के समय, इन कौरवों ने कौन से धर्म का पालन किया था? "यही सही समय है पार्थ, अपना बाण चलाओ!" श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आदेश दिया।
कथा का श्रेय - कथाविश्व
अगले भाग में: निहत्थे कर्ण पर प्रहार और एक महादानवीर का अंतिम क्षण।
सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा - भाग १०
भगवान परशुराम का शाप फलीभूत हो चुका था; मृत्यु के इस सबसे करीब क्षण में कर्ण अपने सभी ब्रह्मास्त्रों के मंत्र भूल गए। वह रथ का पहिया निकालते ही रह गए और अर्जुन का घातक बाण सीधे उनके गले को पार कर गया।
महान योद्धा कर्ण जमीन पर गिर पड़े। कहा जाता है कि उनके अंतिम क्षणों में श्रीकृष्ण ब्राह्मण के वेश में आए और कर्ण से दान मांगा। कर्ण के पास कुछ नहीं था, लेकिन उन्होंने पत्थर से अपना सोने का दांत तोड़कर उस ब्राह्मण को दे दिया।
इस महादान को देखकर श्रीकृष्ण अपने असली रूप में प्रकट हुए और उन्होंने कर्ण को मोक्ष का वरदान दिया। इस प्रकार जन्म से लेकर मृत्यु तक संघर्ष करने वाले, और मित्रता व दान की नई परिभाषा गढ़ने वाले सूर्यपुत्र कर्ण ने सदा के लिए आंखें मूंद लीं।
कथा का श्रेय - कथाविश्व

कोणत्याही टिप्पण्या नाहीत: