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गरुड़ पुराण ✍ रुपाली

भाग 1: नैमिषारण्य में ऋषियों का समागम और कथा का आरंभ

✍️ लेखिका: पूजा

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

प्रिय पाठकों, मैं पूजा, आज आपको उन प्राचीन और पवित्र दिनों की यात्रा पर ले चलती हूँ, जब धरती पर धर्म, तपस्या और सत्य का ही बोलबाला था। गोमती नदी के तट पर स्थित पावन 'नैमिषारण्य' तीर्थ (जिसे आज हम नैमिषारण्य धाम के नाम से जानते हैं) में शौनक आदि अट्ठासी हज़ार तपस्वी ऋषि-मुनि एकत्रित हुए थे। उनका उद्देश्य विश्व के कल्याण और शांति के लिए एक विशाल यज्ञ करना था, जो कई वर्षों तक चलने वाला था।

एक दिन प्रातःकाल की वेला में, जब सभी ऋषि-मुनि नदी में स्नान करके अपना नित्य कर्म और अग्निहोत्र (हवन) पूर्ण कर चुके थे, तब वहां पुराणों के महान ज्ञाता और महर्षि वेदव्यास जी के परम शिष्य, श्री सूत जी महाराज पधारे। सूत जी का मुखमंडल तपस्या और ज्ञान के ब्रह्मतेज से दमक रहा था।

उन्हें आते देख सभी ऋषिगण सम्मान से उठ खड़े हुए। आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया गया और एक ऊंचे, कुशा के आसन पर बिठाया गया। जब सूत जी ने विश्राम कर लिया, तब ऋषियों के मुखिया महर्षि शौनक जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र भाव से पूछा:

"हे अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाले महाज्ञानी सूत जी! आपने महर्षि व्यास जी के चरणों में बैठकर संपूर्ण वेदों, उपनिषदों और पुराणों का रहस्य जाना है। तीनों लोकों में ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जो आपसे छिपा हो।"

शौनक जी ने चिंता भरे स्वर में आगे कहा, "हे मुनिवर! आने वाला समय कलियुग का है। कलियुग के प्रभाव से मनुष्यों की आयु बहुत कम रह जाएगी। लोग लोभ, मोह, क्रोध और पाप-कर्मों में लिप्त हो जाएंगे। हे नाथ! ऐसे भटके हुए प्राणियों के उद्धार का सरल मार्ग क्या है? मृत्यु के बाद जीवात्मा की क्या गति होती है? परलोक का वह मार्ग कैसा है?"

ऋषियों के ये परोपकारी और जनकल्याणकारी प्रश्न सुनकर सूत जी अत्यंत प्रसन्न हुए। कथा के इस प्रसंग को लिखते हुए मैं, पूजा, स्वयं महसूस कर सकती हूँ कि उस समय सूत जी के मन में संसार के प्रति कितनी करुणा रही होगी। उन्होंने मन ही मन क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन कर रहे परमपिता श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी के चरण कमलों का ध्यान किया।

सूत जी अपनी मधुर वाणी में बोले, "हे शौनक जी! हे तपस्वी मुनियों! आपने संपूर्ण जगत के कल्याण के लिए बहुत ही उत्तम प्रश्न पूछा है। मैं आपको वह परम गोपनीय कथा सुनाऊंगा, जिसे स्वयं भगवान नारायण ने अपने परम भक्त और वाहन, पक्षीराज गरुड़ जी को सुनाया था।"

सूत जी ने आगे कहा, "यह कथा 'गरुड़ पुराण' के नाम से तीनों लोकों में विख्यात है। जो भी मनुष्य इसे श्रद्धा से सुनता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।"

आइए पाठकों, सूत जी के वचनों के साथ मैं पूजा भी आपको उसी समय में ले चलती हूं, जब स्वयं पक्षीराज गरुड़ के मन में मृत्यु और परलोक को लेकर यही प्रश्न उठे थे और वे समाधान के लिए भगवान विष्णु के पास वैकुंठ पहुंचे थे।

अगले भाग में आप पढ़ेंगे:
पक्षीराज गरुड़ अपने मन में उठ रहे मृत्यु, यमलोक और आत्मा के सफर से जुड़े भयानक और रहस्यमयी प्रश्नों को लेकर वैकुंठ धाम पहुंचते हैं। जब गरुड़ देव भगवान विष्णु से पूछते हैं कि "हे प्रभु! मृत्यु के बाद पापी आत्मा यमलोक तक का भयानक रास्ता कैसे तय करती है और उसे यमदूत कैसे ले जाते हैं?" तो श्रीहरि इसका क्या उत्तर देते हैं? जानने के लिए पढ़ें अगला भाग।

प्रिय पाठकों,
मैं आपकी अपनी लेखिका पूजा, आशा करती हूँ कि गरुड़ पुराण का यह पहला भाग आपके हृदय को छू गया होगा। अगर आपको मेरी लेखनी और यह पावन कथा पसंद आई हो, तो कमेंट बॉक्स में "जय श्री हरि" जरूर लिखें। 100 भागों की इस महाकथा के अगले भाग की सूचना सबसे पहले पाने के लिए मेरी वेबसाइट को Bookmark करना न भूलें। आपके विचार और स्नेह का मुझे हमेशा इंतज़ार रहेगा!



क्रमश:
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